सपनों को चली छूने

A Jagran Pehel initiative for Women Empowerment.

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SKCC


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Girls are more energetic, intelligent!

Posted On: 3 Aug, 2010  
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Misconception must stop

Posted On: 5 Jul, 2010  
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Dowry should be banned strictly

Posted On: 1 Jul, 2010  
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उस दिन सवालों का सागर उमड़ पड़ा था

Posted On: 24 Jun, 2010  
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I want to become role model

Posted On: 20 Jun, 2010  
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It’s us, who willingly surrender…

Posted On: 17 Jun, 2010  
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अत्याचार से तंग आकर उसने खुदकुशी की, वह मेरी मां थी..

Posted On: 13 Jun, 2010  
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ज्यादातर परिवारों में उपेक्षित ही हैं बेटियां

Posted On: 11 Jun, 2010  
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मैं एक लड़की हूँ , मेरे अनुभव

Posted On: 8 Jun, 2010  
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आत्मनिर्भर बेटियां भी बन सकती हैं मां-बाप का सहारा

Posted On: 7 Jun, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के द्वारा:

मै अपने इस लेख के माध्यम से हिन्दुस्तान के कुछ दिखावा परस्त लोगो का ध्यान आकर्षित करना चाहता हू ....हो हल्ला करने वाले उन लोगो से जो अखबार में फोटो छपवाने और टीवी में लाइव शो में आने के लिए हाहाकार मचाये फिरते है के भ्रूण हत्या बंद हो क्यों बंद हो ..क्या कोई बाप अपनी लड़की को जन्म दे पाले पोसे बड़ा करे इस लिए के उसके साथ बलात्कार होगा ,या इस लिए के दहेज न दे के पाने की मजबूरी के बाद अपनी जान से भी प्यारी लड़की की जली हुइ लाश देखने को मिलेगी ,या फिर इस लिए के स्कूल कॉलेज जाते समय चौराहे पर बैठे गुंडे मेरी लड़की को छेड़े,और अगर गुंडों को जवाब दो तो वो उसके मुह पर तेज़ाब फेंके ...क्यों भ्रूण ह्त्या बंद हो ....क्या इस पूरेभारत में एक भी ऐसा नेता ;एक भी ऐसा समाज का ठेके दार ,एक भी ऐसी सरकारी या गैर सरकारी संथा है जिसने इस विषय पर हो हल्ला करने की बजाय एक सच्ची और इमानदार कोशिस की हो नहीं है .मै गारंटी लेता हू और भारत में हर लड़की का बाप ये गारंटी लेने को तैयार होगा के भ्रूण ह्त्या बंद हो जायेगी यहाँ तक के आज के नवजवान युवक और नवुवतियों द्वारा नादानी में की गई गलती के बाद भी भ्रूण हत्या का विचार वो दिल से निकाल देंगे और एक और जिन्द्गगी साँस लेती रहेगी फलेगी फुलेगी यानी के जिन्दा रहेगी कैसे ....हमारे भारत में बड़े बड़े धनाड्यलोग है उन लोगो को चाहिए के हाय हाय भ्रूण ह्त्या करने की बजाय एक ऐसी संथा का निर्माण करे जो पूरे भारत में ये ऐलान कर दे के "यदि आपके घर कन्या जन्म ले तो उसकी जिमेदारी मेरी" सम्बंधित संथा उसकी पुत्री का जन्म से लेकर और पढ़ाई फिर शादी तक सारा खर्च उठाएगी तो क्या पूरी दुनिया से उस संथा को समर्थन नहीं प्राप्त होगा कितनी सहायता राशी उस संस्था के पास आयेगी कोई सोच भी नहीं सकता है फिर भारत का हर बाप इतना दुर्बल तो नहीं है के पूरे भारत की लड़किया आ जायेंगी शादी के लिए लेकिन एक बात तय है के भ्रूण ह्त्या बंद हो जायेगी ...मित्रों ये है एक ईमानदार कोशिस भ्रूण ह्त्या रोकने की अन्यथा दुनिया की कोई सजा ,कोई डर भ्रूण ह्त्या को रोक नहीं सकता है .....ये जोर जोर से टीवी और अखबार पर बलबलाने वाले उस कमजो र और निर्धन बाप से पूछे के "लड़की पैदा हुई है "शब्द जब कानो को सुनाई देता है तो वो दींन हीन बाप सर पकड़ कर धम्म से जमीन पर क्यों बैठ जाता है....है कोई पूछने वाला . ये बड़े -२ धनाड्य लोग बड़ी -२ डिग्रीयो वाले नेता एवं समाज सेवक कभी ज़रा अपनी A.C. कार,A.C.रूम से बाहर 48 डिग्री के तापमान पर तारकोल की तपती सड़क पर नंगे पैर चल कर मजदूरी करने जाते उस बूढ़े बाप से पूछे जिसके घर में तीन तीन शादी के लायक लड़किया बैठी है मगर वो शादी के लायक दहेज नहीं जोड़ पाता है और आँख में आंसू भरे इस दुनिया को अलविदा कह जाता है और कह जाता है जाते जाते "अगले जनम मोहे बिटिया न दीजो " क्या इतने नादान है ये समाज के ठेकेदार,ये सफेदपोश नेता के जो इतना भी नहीं जानते की यदि हमें समाज रूपी जंगल से बुराई रूपी पेड़ को उखाडना है तो उसकी पत्तियाँ नोचने मात्र से क्या वो पेड़ समाप्त हो जायेगा या की उसकी जड को उखाड़ना होगा .

के द्वारा:

प्रिय श्रधा तुम जसी लड़किया ही इस पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को बदल सकती हैं तुम्हारा आत्म विश्वाश देख कर मुझे मेरी बहन याद आ गयी जो तु८म्म्हारि तरह ही इक्श्हा शक्ति से भरपूर थी आजाद खायालू की लड़की जो आज इस दुनिया में नहीं है पैर आज भी उसके सपने जिन्दा हैं ,मुझे बार-बार पुकारते हैं की अमित मैं भी प्रोफ़ेस्सिओनल कुर्ष करना चाहती हूँ ,तुम्हारी तरह मई भी बड़े शहरो में जाकर जॉब करना चाहती हूँ ,पैर आज वो नहीं है ,दो साल पहले जब मई अपनी इंजीनियरिंग के अंतिम इयर की पढाई पूरी कर रहा था तो उसने अपनी जिंदगी की अंतिम साँस पूरी केर ली ,लखनऊ के संजय गाँधी अस्पताल में..अपने सपनो को लाकर चली गयी भवान के पास शायद यह पुचने की हे भगवान् मेरी क्या गलती थी की मुझे लड़की बनाया ... मध्य वर्ग परिवार में होने के नाते मेरे पिताजी(वकील) ने मुझे इंजीनियरिंग की पढाई के लिए तो एदुकतिओन लोन ले लिया पर दीदी के लिए नहीं...शायद इसलिए की वो लड़की थी .... मेरे छोटे भाई को भी मेरी दीदी ने बनारस भेजने के ल्किये पापा से रेकुएस्ट किया ,,पैसे भी दीदी ने खुद मानगे किये ,पैर ये बात अगर दीदी के लिए होती तो शायद मई भी दबे स्वर में इगनोरे ही करता...केवल इसलिए की वो लड़की थी और एक लड़की को एक सीमा में रहना चाहिए जब तक की वो अपने माँ-बाप के पास है...शायद मई गलत था ,पैर अब ये पश्चताप करने के लिए भी तो अब वो नहीं रही... मेरी सजा यही है की राखी के दिन मई अपनी कलाई सुनी रखूंगा अपनी प्यारी सी बहना की याद में...और असके ऊपर किये गए नाइंसाफी के पश्चाताप के लिए .... पैर तुम अपनी लडाई जारी रखना...मई तुम्हारे साथ हु

के द्वारा: amitdubey amitdubey

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मैं आपके विचारों की कद्र करता हूँ और आपकी बात से काफी हद तक सहमत हूँ परन्तु धीरे धीरे औरतों के हालात में सुधर आ रहा है आज संसद भवन से लेकर सभी जगहों पर औरतों ने अपनी उपस्तिथि दर्ज करवाई है और इसमें उनके परिवार वालों का भी साथ रहा है . लेकिन तकलीफ जब होती है जब मै किसी महिला के मुख से ये सुनता हूँ कि "मैं क्या कर सकती हूँ मै तो एक औरत हूँ " और मुझे किसी लेखक के ये पंक्तियाँ याद आती हैं "नारी जीवन तेरी यही काहानी आँचल में है दूध और आँखों में है पानी " मै आपके परिवार वालों को भी धन्यवाद् देता हूँ जिन्होंने आपको इस काबिल बनाया कि आज आप इतना सोच सकती हो और अपनी सी प्रतिक्रिया के माध्यम से सभी लोगों से ये अनुरोध करता हूँ कि अपने घरों कि लड़कियों और लड़कों में कोई भेद न करें और दोनों को ही आगे बढ़ने के समान अवसर प्रदान करें और अंत में आपके इस लेख के लिए आपको मेरी तरफ से बहुत बहुत धन्यवाद दीपक जैन

के द्वारा:

माना की भारत मे आज भी पुरुष प्रधान समाज है किन्तु यदि स्त्री को खुद मे विश्वास है, खुद की काबिलियत है तो उसे पुरुषो को जवाब देने के जरुरत ही क्यूँ है ? वो आराम से अपनी जिंदगी अपने दम पर जी सकती है | माना की आज के समय मे ये बात थोड़ी सी अटपटी लगे किन्तु जिस तरह पिछले १० सालो मे दुनिया बदली है उसे देखते हुए आने वाले ५ सालो मे ये एक आम बात हो सकती है (कम से कम यदि वो शहर मे है तो ) | रही बात धोखा देने की तो मेरे समझ मे ये नहीं आता की आखिर तुम ये क्यों सोच रहे हो की गलती हुई ? जो हुआ वो सुखद पल तुमने भी सुख के साथ महसूस किया था | क्या होता अगर ये ही धोखा कोई आदमी शादी करने के बाद देता ? ज्यादा से ज्यदा उसे कानून की वजह से हर्जाना देना पड़ता ? तो क्या तुम उस हर्जाने के लिए शादी करना चाह रही हो ? अगर तुम्हारी खुद की इच्छाशक्ति प्रबल है और तुम शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाना चाहती हो तो मना कर दो | यदि व्यक्ति वास्तव मे प्रेम करता है तो वो निश्चय तुम्हरी राय का सम्मान करेगा | साफ़ सीधी बात , पहले खुद को काबिल बनाओ तभी इस प्यार के चक्कर मे पड़ो | खुद को कमजोर समझना छोड़ो अगर तुम घर चला सकती हो तो अन्तरिक्ष मे राकेट भी उड़ा सकती हो |

के द्वारा:

इतने अधीर क्यों होते हैं दिलीप जी, क्या हम पुरुषों के कंधे इतने कमजोर हो चुके हैं कि अपने माता-पिता और भाई बहनों की जिम्मेदारी न उठा सके. अभी बहनों को और आगे बढ़ने दें, वे भी माता पिता की खिदमत में पीछे नहीं रहेंगी. जहाँ तक संपत्ति के अधिकार की बात है पुत्री का अधिकार बिलकुल जायज है. जब बहनें अच्छा करने के लिए आगे बढ़ रही हो तो उनका मार्ग प्रशस्त करना बेहतर होगा उन पर सवाल या जिम्मदारियां थोपना नहीं. खुशबू जी को कहीं न कहीं नारियों की अशिक्षा कचोट रही है. आशा है कि वे इस सन्दर्भ में कोई सार्थक पहल करेंगी. कम से कम उन माता-पिता को जाग्रत करने की कोशिश तो जरूर करेंगी जो लड़कियों को लिंग-भेद के कारण शिक्षा के अवसर उपलब्ध नहीं कराते. क्या मैं सही कह रहा हूँ खुसबू जी ?

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के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

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पल्लवी जी , आपका लेख भी ऐसे ही कुछ अति उत्साही विद्वानों सा ही है जो महिलाओ की बात करते समय उन्हें युगों युगों से शोषित , दुखी ,मजबूर , और जीवन के सभी सुखो से वंचित जिव के रूप में प्रस्तुत करने में अपनी विद्वता समझते है . वास्तु इस्थिति क्या इतनी ज्यादा ख़राब रही है ? अगर इतिहास को ध्यान से देखे तो ये पता चल जाता है की भारत की नारी आदिकाल से ही पुरुष की सहयोगी सहभागी रही है और और दोनों को एकदूसरे का पूरक माना गया है आज के क्रांतिकारी विचारको ने महिला और पुरुष को एकदूसरे के पूरक की जगह प्रतिद्वंदी बना दिया है ,, अब सवाल ये उठता है की समाज के लिए दोनों का कौन सा रूप जरूरी है प्रतिद्वंदी का या पूरक का .... ये बात सही है की महिलाओ की स्थिति पुरुषो की अपेक्षा कमजोर है पर क्या इतनी अधिक ख़राब है? गावो की महिलाये पूरी स्वतंत्रता का उपभोग करती है पुरुषो के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खेतो में काम करने से लेकर, दुकान संभालना , मजदूरी करना सभी काम करने में आगे है . इसके अलावा सामान्य घरो में भी महिलाये घर की व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाती है और उन्हें पूरा सम्मान मिलता है , स्त्री और पुरुष प्राक्रतिक और मानसिक रूप से भिन्न है तो जाहिर है की उनकी विशेस्ताये ,कार्य ,व्यवहार,सभी में प्रकृति प्रदात भिन्नता होगी नारी में मातृत्व की विशिष्ट शक्ति है तो स्पष्ट रूप से उसमे दया ,करुना , ममता , नाजुकता इत्यादि गुण होंगे ही ,और इस कारन उसके योन व्यवहार का नियंत्रण में रहना जरुरी भी है और उचित भी अन्यथा एक प्रकार की सामाजिक अराजकता की इस्थिति उत्पान्न हो जाएगी क्योकि नियंत्रित यौन व्यवहार समाज के स्थाईत्व के लिए जरुरी है अन्यथा जानवरों और मनुष्य का फर्क मिट जायेगा ..अब ये कह दीजिये की पुरुष गर्भ धारण नहीं करता तो नारी क्यों करे ? नारी को भोग किये जाने की वास्तु , पुरुष के यौन संतुष्टि का माध्यम, स्त्रियोचित गुणों को उसकी मजबूरी इत्यादि संज्ञाए देकर जो तथाकथित उदारवादी विचारक समझते है खुद को वे ऐसी अनगिनत नारियो को जो माँ,है बहन है ,प्रेयसी है ,पत्नी है ......पूरक है ,उन्हें एकप्रकार से अपमानित ही करते है ...... आपकी ये बात अच्छी लगी की आपको एक लड़की होने का गर्व है ,,बस यही गर्व उन अनगिनत महिलाओ को भी है ..जो पूरी तरह निस्वार्थ भाव से प्रकृति(शक्ति) के रूप में पुरुष(शिव) के सहयोग से श्रृष्टि(समाज) को चला रही है ..उनका सम्मान कीजिये, हम पुरुष है और नारी का उतना ही सम्मान करते है ...जिसकी वह अधिकारिणी है..

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हर समाज की अपनी कुछ मान्यताएं होती हैं और उन मान्यताओं पर चलकर वह स्वयम ही बेहतर रास्ते तलाश कर लेता है. भारत में नारी के साथ अत्याचार की जितनी दास्ताँ कही-सुनी जाती है कई बार उनमें सच्चाई कम और प्रचार का मकसद अधिक होता है. अधिकाँश केसों में यही पाया गया कि किसी ने किसी और को बदनाम या परेशान करने की खातिर स्त्री प्रताड़ना को हथियार बना लिया. आज नारी सबलाकरण की बात हो रही है. समाज की स्थिर और आनंदमयी धारा को बदल कर नए समाज की रचना की कोशिशें हो रही हैं. यह एक प्रकार से विग्रह पैदा करने की बात है. सशक्तिकरण के नाम पर उद्दंडता और व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिल रहा है. आज चारो ओर अधिकार मांगे जा रहे हैं. कर्त्तव्य बिना अधिकार किस दिशा में ले जाकर छोड़ेगा समाज को यह सबसे अधिक चिंता का विषय है.

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सचमुच अपने उपर गर्व होना बहुत अच्छी बात है, परन्तु आपका यह कहना कि -स्त्री-पुरुष दोनों की रचना मैं ही करती हू.क्या अतिवादी नहीं है ? स्त्री वास्तव में हर जगह, हर समय सम्मान की हकदार है, पर यह भ्रम पालना न पुरुष और न ही स्त्री के लिए सही है कि.स्त्री-पुरुष दोनों की रचना स्त्री करती है. यहां चेतन भगत की पुस्तक one night at the call center के अभार में लिखी वह बात याद करने की जरूरत है जिसमें वह अपनी पत्नी का अभार व्यक्त करते हुए लिखते हैं (यहां लिखी हुई बातों का सार दिया जा रहा है)- मैं अभारी हूं अपनी पत्नी का जिसने मेरे जुड़वा बच्चों को पैदा किया. इस लाईन के उपर एक स्टार लगा हुआ है और पेज के निचले हिस्से पर उस स्टार का विवरण यह लिखा गया है कि - मेरी सहायता से. निधि, अापसे भी मेरी यही उम्मिद है कि आप इस बात को समझने की कोशिश करेंगे.

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नीतू जी आपने सही लिखा है कि सचमुच आज भी लड़की बेबस है। लड़की को कमजोर करने का सबसे बड़ा दानव दहेज है। अब भी कम से कम यूपी-बिहार में तो यही हालत है कि लड़की पैदा होते ही मां-बाप के चेहरे लटक जाते हैं। घर से लेकर बाहर तक लड़की तीखी नजरों का शिकार होती है। लेकिन सच कहूं तो जिसके घर लड़की नहीं है वहां एक अजीब सा खालीपन नजर आता है। ये वही महसूस करते हैं जिनके घर लड़कियां नहीं है। वैदिक काल में अपाला,घोषा जैसी विद्युषी महिलाओं का जिक्र आता है। स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी के योगदान को कौन भूल सकता है। शिवाजी को तैयार करने में उनकी मां जीजाबाई के योगदान को कौन नहीं जानता। लेकिन बेटी जब बड़ी होने लगती है तो पिता को उसके शादी की चिन्ता सताने लगती है। जब शादी की बात आती है तो उसमें भी लड़कों की इच्छा को ही ज्यादा महत्व मिलता है। लड़के की मर्जी वह जितनी चाहे लड़कियों का इंटरव्यू ले और उन्हें रिजेक्ट करे। यह कहां का न्याय है कि एक लड़की को अपनी इच्छा के मुताबिक वर चुनने की स्वतंत्रता न दी जाए. प्राचीनकाल में स्वयंवर की प्रथा में लड़कियां खुद वर चुनती थीं। हां बदलते दौर में अब लड़कियां भी आवाज उठाने लगी हैं। यहां गोरखपुर के आसपास के जिलों में ही ऐसी कई घटनाएं हुईं जिसमें पाणिग्रहण संस्कार के दौरान ही लड़कियों ने नशे में धुत दूल्हों से शादी से इनकार कर दिया। अंतरजातीय विवाहों से भी दहेज के दानव पर चोट पड़ रही है। जैसे-जैसे स्त्री शिक्षा बढ़ रही है समाज में बदलाव नजर आ रहा है। ऐसे लोग भी समाज में सामने आ रहे हैं जो गर्व के साथ कह रहे हैं कि हमें बेटा नहीं सिर्फ बेटियां चाहिए। मेरे एक पीसीएस मित्र और उनकी पत्नी ने संकल्प ले रखा है कि ईश्वर कृपा से एक बेटी है,अब बेटा नहीं चाहिए। हालाकि उनकी मां खासतौर से उनको मनाने में लगी रहती हैं कि अब भी उनको बेटा हो जाए। लेकिन पीसीएस मित्र और उनकी पत्नी पूरे भरोसे के साथ कहते हैं कि मेरी इकलौती बेटी ही बेटे का फर्ज निभाएगी। इस परंपरा को भी समाज ने ठुकरा दिया कि मरने पर पिता को बेटा ही मुखाग्नि देगा,यह काम भी बेटियां बखूबी कर रही हैं। गोरखपुर में तकरीबन तीन साल पहले अपनी मां के मरने पर बेटियों ने न केवल कंधा देकर उसे शमशान पहुंचाया अपितु मुखाग्नि भी दी। अब तो यह परंपरा में आ चुका है। यह सच है कि समाज में बदलाव आ रहा है लेकिन लंबे समय तक जिस स्त्री समाज के पैरों में बेड़ियां डाली गई हो उसे काटने में थोड़ा वक्त तो लगेगा ही और खुशी इस बात की है कि स्त्रियां ही इस बेड़ी को काट रही हैं। किससे इंसाफ की उम्मीद की जाए,इन रहनुमाओं से जो संसद में महिला आरक्षण का विधेयक पास नहीं होने दे रहे हैं।जाति के नाम पर महिला विधेयक की राह में कांटे बिछाए जा रहे हैं। जिस तरह संविधान में दलितों को शोषित मानकर आरक्षण की व्यवस्था की गई है उस तरह की व्यवस्था स्त्रियों के लिए क्यों नहीं की जाती। शोषण के तराजू पर यदि स्त्री और दलित को रखा जाए तो स्त्रियां कहीं ज्यादा शोषित मिलेंगी। इस मामले में सभी राजनीतिक दलों की नीयत एक जैसी दिखाई देती है।डार्विन ने भी कहा था कि जो जातियां संघर्ष कर अपने को रेस में बनाए रखती हैं उन्हीं का वजूद बचा रहता है,इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि परिस्थितियों का हौसले से मुकाबला किया जाए। स्त्री संसार की गौरव है। पार्वती के बिना शिव अधूरे हैं तो स्त्री के बिना मानव जाति के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती है।

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पूनम जी आपके ब्लोग दो- तीन दिनों से पढ रहा हू । आपसे गहरी सहानुभुति है । लेकिन तारिफ़ की एक दो लाइन कह कर अपनी बात खत्म करने के बजाय मै कुछ और बोलना चाहूंगा - जब आपके पति आप पर शारिरिक अत्याचार करते थे तो आप ने पुलिस मे शिकायत क्यों नही की , अपने आस पास के लोगो से, सगे सम्बंधियों से सहायता क्यों नहीं लिया । बेवजह इंसान जुल्म तभी सहता है जब या तो अन्दर से वो खुद हि बहुत कमजोर हो या फ़िर जुल्म करने वला बहुत ताकतवर हो। मुझे तो, आपके बारे मे पहली बात ज्यदा सच दिखायी दे रही है । आज के समय मे नारी को अपने आप को इतना कम्जोर कर के आंकना बेवजह हि लगता है । हमारा कानून, हमारा समाज,… प्रत्येक चीज आज के समय मे नारी- शक्ति को प्रोत्सहित करती है , बावजूद इसके हम आज भी अपने अप को उतना ही कमजोर समझें जितना आज से सौ साल पहले थे, तो इस समय रूपी बदलाव का क्या फ़ायदा ? एक और बात – सघर्ष और सफ़लता दो विपरित आयाम है और अक्सर ही सघर्ष करने वाले जीवन भर सघर्ष ही करते रह जाते है । ये आप को तय करना है कि आप को क्या करना है, यदि सफ़ल बनना है तो संघर्ष मत करिये , सही दिशा मे प्रयास करिये ।

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के द्वारा: Anand Rai, Jagran Anand Rai, Jagran

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